आंधी में भी जलती रही मशाल दुनिया ने माना यह था गाँधी जी का कमाल
मोहन से बापू, महात्मा , साबरमति के संत से लेकर राष्ट्रपिता कहलाने का गौरव महात्मा गाँधी को मिला है | इसकी सबसे बड़ी वजह सत्य अहिंसा शान्ति के लिए किये गए उनके प्रयास हैं | जिस तरह से आज पढ़ लिखकर पैसा कमाना एक परिवार को चलाने के लिए आवश्यक हो गया है उसी प्रकार परिवार को बनाये रखने के लिए सत्य अहिंसा और शान्ति को जीवन में अपनाना अति आवश्यक हो गया है | आज परिवार में बिखराव और विघटन का सबसे महत्वपूर्ण कारण बापू के सत्य अहिंसा और शान्ति के सिद्धांतों की अवहेलना करना हो गया है |
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यह एक कटु सत्य है जिसे स्वीकारना किसी के लिए भी बड़ा मुश्किल है | छोटी छोटी बतों के लिए छोटे मुद्दों के लिए थोड़े से लाभ और थोड़े से नुकसान के लिए हम हिंसा पर उतर जाते हैं | लड़ाई झगडे मोल ले लेते हैं | जिन बातो और नफे नुकसान को हम सहन करने की क्षमता रखते हैं, जिनके हल बातचीत से निकाले जा सकते हैं ,जिन बातो के लिए दुश्मनी पालने की आवश्य्कता नहीं है, उनमे भी हम गुस्सा , क्रोध, तनाव बढाकर दुश्मनी पाल लेते हैं |
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यहाँ तक की सच बोलने के लिए भी हम हिंसक प्रवृति अपना लेते हैं जबकि सच को कठोरता से नहीं कोमलता से बोला जाना चाहिए ताकि लोग उसे सुन सके समझ सके।अधिकारों के लिए लड़ना अच्छी बात है | अधिकारों के लिए लड़ने के लिए तर्क होना चाहिए, सोच होनी चाहिए, विचार होने चाहिए। सभी अधिकारों की लड़ाइयां हथियारों से नहीं लड़ी जाती लेकिन हम हर अधिकार की लड़ाई लठ और बन्दुक के दम पर लड़कर उसे हिंसक बना देते हैं.|
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गांधी जी कभी भी अधिकारों के लिए लड़ने में पीछे नहीं हटे बस उनमे और हम में फर्क इतना ही रहा उन्होंने हमसे भी बड़ी बड़ी लड़ाइयां लड़ी हमसे भी बड़े बड़े आंदोलन किये लेकिन बिना हथियारों के | यह अलग बात है की इतने बड़े देश में इतने लोगो को एक साथ लेकर चलने में कुछ घटनाये अनायास हो गयी | गांधी जी ने जितने भी आंदोलन किये अहिंसा और सत्य के दम पर किये | हम हमारे घर के पांच लोगो को एकमत नहीं कर सकते सोच कर देखे क्यों नहीं कर सकते ? और यह भी सोच कर देखे की क्यों गांधीजी सत्य और अहिंसा के दम पर इतने लोगो का नेतृत्व कर सके ?
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चाहे परिवार हो समाज हो या देश हो हम नेतृत्व विहीन सिर्फ इसलिए हैं की हम न तो खुद सत्य अहिंसा और शांति के रस्ते पर चलना चाहते हैं न ही उसे स्वीकारना चाहते है जो इस रास्ते पर चलकर नेतृत्व करना चाहता है | यही वजह है की हर कोई नेतृत्व अपने हिसाब से करके अलग थलग पड़ता जा रहा है | उसे अपना संघर्ष अकेले ही करना पड रहा है शुरुआत संघर्ष की ज़रूर अकेले ही करना चाहिए लेकिन संघर्ष के अंत के लिए लोगो का साथ आवश्यक है | वो भी सत्य अहिंसा के सिद्धांतो पर चलने वालो का | यूं तो मरने के बाद चार लोग हर इंसान को कन्धा देने पहुंचते ही हैं लेकिन भीड़ से ही उसकी औकात का पता चलता है | गाँधी जी की औकात का पता इसी बात से चलता है की आज दुनिया में उनके सत्य अहिंसा के सिद्धांतो की तारीफ़ होती है | चाहे वह दबी जुबान से ही क्यों न हो ?
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